(न्यूज़ – यू पी मिश्रा)
पलिया कलां (खीरी) वर्तमान परिस्थितियों में वैज्ञानिक प्रगति एवम् डिजिटल दर्शन के कारण कूड़े कचरे का उत्पादन कुछ अधिक ही हो रहा है। उसमें बाजारवाद इतना पुरजोर तरीके से अधिकार जमा चुका है कि जैसे उसको अपना उत्पादन बेचने के अतिरिक्त कुछ और सोचना नहीं रह गया है। आज लोग व्यक्तिगत रूप से 100 ML,200 ML,250 ML,500 ML एवम् 1 लीटर वाले पानी की बोतलें, विभिन्न कम्पनियों के कोल्ड ड्रिंक अपने घरों में रखने लगे हैं। इन कम्पनियों के उत्पाद बाजार में धड़ल्ले से बिक रहे हैं। सरकार बार बार नागरिकों से अपील करती है कि प्रदूषण पैदा करने से बचें, प्लास्टिक बोतलों या पॉलीथिन थैलियों का उपयोग कम से कम करें। सरकार को ध्यान देना चाहिए कि प्लास्टिक बोतलों या पॉलीथिन थैलियों को बनाने वाले सरकार से ही लाइसेंस लेते हैं, उसके बाद उत्पादन शुरू करते हैं। ये बात स्पष्ट है कि ऐसी कम्पनियों के मालिक इसको बनाएंगे तो जन सामान्य को सप्लाई भी करेंगे। जनता को, जन सामान्य को रोककर ये प्रदूषण बिल्कुल नहीं रोका जा सकता है। इसके लिए सरकार को स्थायी उपाय सोचने होंगे तो ही स्थायी उपाय किया जा सकता है और तभी इससे आंशिक रूप से सफलता पाई जा सकती है। केवल भाषणों एवम् निराधार नारों से कुछ नहीं होने वाला। हमारी सरकार को इस मामले में गम्भीर प्रयास करने होंगे। और ये सारे उपाय सरकार ही कर सकती है। आज जमीन की स्थिति ये है कि यदि गहराई में खुदाई की जाती है तो 8 से 10 फीट नीचे तक प्लास्टिक की थैलियां पहुंच चुकी हैं और जल स्तर को प्रभावित कर रहीं हैं, बरसात के पानी को नीचे जाने से रोकती हैं और नीचे का जल इनके प्रभाव से प्रदूषित होता रहता है।
