( लेख- जितेंद्र पांडेय एडवोकेट हाई कोर्ट)

क्या यही आधुनिक समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है?
इस लेख को पढ़कर आप लोग भी प्रतिक्रिया दे सकते हैं।
मुंबई के एक प्रतिष्ठित कपड़ा व्यापारी शिव चरण रामरत्न गुप्ता ने जीवन भर ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और अथक परिश्रम से धन कमाया। अपनी तीनों बेटियों को अच्छे संस्कार दिए, उच्च शिक्षा दिलाई, उन्हें आत्मनिर्भर बनाया और अपने सामर्थ्य से बढ़कर उनका पालन-पोषण किया। समय बदला। व्यापार में कठिनाइयाँ आईं। आर्थिक संकट ने उन्हें सब कुछ छोड़ने पर मजबूर कर दिया। अंततः वे अपनी पत्नी के साथ हरियाणा के एक वृद्धाश्रम में रहने लगे। दो वर्ष पहले उनकी जीवनसंगिनी का निधन हो गया। अब कल वे भी इस दुनिया से विदा हो गए।

सबसे अधिक पीड़ा देने वाली बात यह है कि बताया जाता है कि अंतिम संस्कार केवल औपचारिकता बनकर रह गया। जिन हाथों ने बेटियों को चलना सिखाया, उन्हीं हाथों की अंतिम विदाई में अपनापन भी न मिल सका। जिन माता-पिता ने पूरी जिंदगी अपने बच्चों के भविष्य के लिए स्वयं को खपा दिया, उनकी अस्थियों तक को लेने की इच्छा न रही।

यदि यह सच है, तो यह केवल एक पिता की मृत्यु नहीं, बल्कि हमारी संवेदनाओं, संस्कारों और मानवता की भी परीक्षा है।धन, पद और सफलता का कोई अर्थ नहीं, यदि माता-पिता अपने अंतिम समय में अकेले, उपेक्षित और असहाय रह जाएँ। जिस घर में माँ-बाप का सम्मान नहीं, वहाँ समृद्धि भी अधूरी है और शिक्षा भी।

आइए, आज एक संकल्प लें—
अपने माता-पिता का सम्मान करें, उनके साथ समय बिताएँ, उनका हाथ थामें। क्योंकि जब वे चले जाते हैं, तब पछतावे के आँसू भी उन्हें वापस नहीं ला सकते।माता-पिता बोझ नहीं, हमारे जीवन का सबसे बड़ा आशीर्वाद हैं। उनका सम्मान कीजिए, इससे पहले कि समय आपके हाथों से निकल जाए। यदि यह संदेश आपके हृदय को छू गया हो, तो इसे आगे अवश्य साझा करें। शायद किसी की सोच बदल जाए, किसी माँ-बाप की आँखों में फिर से सम्मान और अपनापन लौट आए। मक्कार औलादों का मन पिघल जाए।

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