


(ओमप्रकाश ‘सुमन’)
पलिया कलां (खीरी)उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ द्वारा प्रायोजित श्री गुरुगोविन्द सिंह जी महाराज राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय पलिया कलाँ, लखीमपुर खीरी के संस्कृत विभाग द्वारा ” संस्कृत वाङ्मय में राष्ट्रिय मूल्य” विषयक एक दिवसीय राष्ट्रिय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता डा० सुरचना त्रिवेदी, प्राचार्य आर्य महिला पी०जी० कालेज शाहजहाँपुर ने की। मुख्य अतिथि महामहोपाध्याय प्रोफेसर अमलधारी सिंह (प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहर लाल नेहरू द्वारा 13 जनवरी 1962 को पुरस्कृत) पूर्व प्राध्यापक, वैदिक दर्शन विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी ने अपने उद्बोधन में वेदों में राष्ट्रिय मूल्यों पर विशद चर्चा करते हुए संस्कृत एवं संस्कृति की रक्षा पर विशेष बल दिया। वेदोद्धारक प्रो० सिंह ने वेदो पर बहुत अधिक कार्य किया है जिसके लिए शासन ने उन्हें विभिन्न पुरस्कारो से पुरस्कृत किया है। उन्होंने बताया कि संस्कृत साहित्य केवल धार्मिक ग्रन्थों तक ही सीमित नहीं हैं अपितु इसमें राष्ट्रनिर्माण, समाजकल्याण, लोकमंगल की भावना एवं नैतिक मूल्यों के अनमोल सिद्धान्त निहित हैं। सारस्वत अतिथि प्रो० राम सुमेर यादव पूर्व आचार्य एवम् अध्यक्ष, संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ ने राष्ट्रिय मूल्यों की चर्चा करते हुए कहा कि जिस व्यक्ति को जो दायित्व मिला हुआ है यदि वह उसे कर्मठता एवं ईमानदारी पूर्वक निर्वहन करता है तो निश्चित रूप से वह राष्ट्र के विकास में अपना अमूल्य योगदान कर रहा है। नैतिक और मानवीय मूल्य, कर्तव्य परायणता, सत्यनिष्ठा, बड़ो का आदर एवं लोक कल्याण जैसे मूल्य रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, स्मृतियों में भरे पड़े हैं। जिन्हें अपनाकर मानव अपने विकास के साथ-साथ राष्ट्र के विकास में सहायक हो सकता है। सारस्वत अतिथि श्री संजीव कुमार त्रिवेदी जी ने एक गीत के माध्यम से संस्कृत साहित्य के मूल्यों को अभिव्यक्त किया जो अत्यन्त प्रासांगिक रहा। संगोष्ठी के द्वितीय सत्र शोधपत्रवाचन सत्र में शोध छात्र धीरेन्द्र वाजपेयी, अनूप विश्वास, स्मृता पाण्डेय, नेहा यादव, शालिनी शुक्ला, आरती अवस्थी, वैशाली, मृणालिनी विश्वकर्मा, प्रभृति लगभग 30 शोधार्थियो एवं प्राध्यापको ने शोधपत्र वाचन किया। संगोष्ठी के सम्पूर्ति सत्र के मुख्य अतिथि पलिया नगर के माननीय उपजिलाधिकारी श्री पुष्पक जी रहे जिन्होने ने अपने उद्द्बोधन में संस्कृत के पठन-पाठन एवं प्रचार-प्रसार पर बल दिया। मंचस्थ समस्त विद्वान अतिथियों का महाविद्यालय के प्राचार्य एवं संगोष्ठी संयोजक डा० सूर्यप्रकाश शुक्ल ने बैज अलंकरण, माल्यार्पण, उत्तरीय एवं समृति चिन्ह के द्वारा स्वागत और अभिन्नदन किया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन प्रो० सत्यकेतु संस्कृत एवं प्राकृत भाषा विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय लखनऊ के द्वारा किया गया। महाविद्यालय के वाणिज्य विभाग के प्रवक्ता डा० वसीम खान ने आये हुए समस्त अतिथियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया। अन्त में प्रणाण पत्र वितरण महाविद्यालय कुलगीत एवं राष्ट्रगान के साथ संगोष्ठी का समापन किया गया। इस अवसर पर आचार्य धनुषधारी, विश्वकान्त त्रिपाठी, डा० रीना तिवारी, प्रमोद दिक्षित, डा० जयन्ती सिहं एवं महाविद्यालय के कर्मचारी विश्राम, आकर्ष विश्वकर्मा, अजय कुमार यादव, अशोक, धोखेराम, परविन्दर उपस्थित रहे। यह जानकारी महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ सूर्य प्रकाश शुक्ल ने दी।
