(ओमप्रकाश ‘सुमन’)
पलिया कलां (खीरी) हमारी मिट्टी, हमारे रक्षक: आत्मनिर्भर भारत की नई गूँज”‌।जब इरादे फौलादी हों और वफादारी अपनी मिट्टी से जुड़ी हो, तो सफलता निश्चित रूप से कदम चूमती है। इसी संकल्प को साकार करते हुए दिनांक 10.04.2026 को 39वीं वाहिनी, सशस्त्र सीमा बल पलिया कलां में एक गौरवपूर्ण उपलब्धि दर्ज की गई । कमांडेंट रबीन्द्र कुमार राजेश्वरी एवं डॉ. शालिनी परिहार, कमांडेंट (पशु चिकित्सा) के मार्गदर्शन में देशी नस्ल भारतीय परीह नस्ल के दो श्वानों स्नोवी (C1042)–नशीले पदार्थों की पहचान में विशेषज्ञ (Narcotics Expert)
बेला (C1043) – विस्फोटकों की पहचान में दक्ष (Explosive Expert) ने दिनांक 06.10.2025 से 10.04.2026 तक चले कठोर प्रशिक्षण के प्रत्येक चरण को सफलतापूर्वक पार करते हुए अंतिम मूल्यांकन परीक्षा में अपनी उत्कृष्टता सिद्ध की । यह उपलब्धि न केवल 39वीं वाहिनी के लिए, बल्कि पूरे सशस्त्र सीमा बल के लिए गर्व का विषय है। पलिया कलां के इस परिसर से निकली यह प्रेरणादायक कहानी ‘स्वदेशी’ की शक्ति और सामर्थ्य को उजागर करती है । अक्सर उपेक्षित रही परिया (Indian Pariah Breed) नस्ल ने यह सिद्ध कर दिया है कि बुद्धिमत्ता, सूंघने की क्षमता और साहस के मामले में यह किसी भी विदेशी नस्ल से कम नहीं है, बल्कि कई मायनों में बेहतर है । इस अवसर पर कमांडेंट महोदय ने पीलीभीत एवं रानीखेत मुख्यालय के प्रशिक्षकों (Handlers) की सराहना की, जिन्होंने अपने अथक परिश्रम, धैर्य एवं समर्पण से इन श्वानों को एक सक्षम “देश का रक्षक” बनाया । उन्होंने कहा कि इन स्वदेशी श्वानों की तीव्र सूंघने की क्षमता और फुर्ती सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाएगी । यह पहल ‘Make in India’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के संकल्प को नई दिशा देती है, यह दर्शाते हुए कि देश की सुरक्षा के लिए अब विदेशी संसाधनों पर निर्भरता कम की जा सकती है। अंततः यह संदेश स्पष्ट है—“जब रक्षक स्वदेशी हों, तो सुरक्षा की गारंटी और भी सुदृढ़ हो जाती है।”
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