

(ओमप्रकाश ‘सुमन’)
पलिया कलां (खीरी) खम्भारखेड़ा लखीमपुर बजाज हिन्दुस्थान शुगर लिमिटेड चीनी मिल खम्भारखेड़ा द्वारा ग्राम लौकिहा में बसंतकालीन गन्ना बुवाई को बढ़ावा देने के उद्देश्य से एक भव्य कृषक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसान एवं कृषि विशेषज्ञों ने भाग लिया।
इस अवसर पर उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद, शाहजहांपुर के वैज्ञानिक सहायक निदेशक डॉ. परवीन कुमार कपिल, गन्ना विकास परिषद खम्भारखेड़ा के ज्येष्ठ गन्ना विकास निरीक्षक सुरेश कुमार चौधरी, चीनी मिल के महाप्रबंधक (गन्ना) पुष्पेंद्र ढाका, सहायक महाप्रबंधक (गन्ना) संजीव कुमार, क्षेत्रीय प्रभारी अनूप अवस्थी और अशोक कुमार सहित सैकड़ों किसान उपस्थित रहे।
डॉ. परवीन कुमार कपिल ने बसंतकालीन गन्ना बुवाई की आधुनिक तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने किसानों को भूमि एवं बीज शोधन, अधिकतम उत्पादन तकनीक, और फसल संरक्षण उपायों के बारे में जागरूक किया। उन्होंने सलाह दी कि गन्ने की पंक्ति से पंक्ति की दूरी न्यूनतम 4 फीट रखें, मृदा परीक्षण के आधार पर संतुलित उर्वरक का प्रयोग करें तथा स्वीकृत गन्ना प्रजातियों की बुवाई करें। साथ ही उन्होंने बीज उपचार (थायोफिनेट मिथाइल), भूमि उपचार (ट्राइकोडर्मा), सिंगल बड तकनीक, ट्रेंच विधि, जैविक खाद, संतुलित उर्वरक प्रयोग एवं पेड़ी प्रबंधन जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर भी प्रकाश डाला।
ज्येष्ठ गन्ना विकास निरीक्षक सुरेश कुमार चौधरी ने किसानों को विभागीय योजनाओं की जानकारी दी और प्रदेश में स्वीकृत व उन्नत गन्ना प्रजातियों की बुवाई करने पर बल दिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट रूप से कहा कि प्रदेश में अनुपयुक्त्त, प्रतिबंधित या अस्वीकृत गन्ना प्रजातियों (नकली 9709, एच.आर. 119, तथा पी.बी. की प्रजातियों) की बुवाई किसी भी स्थिति में न करें।
इस अवसर पर महाप्रबंधक (गन्ना) पुष्पेंद्र ढाका ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि बसंतकालीन गन्ना बुवाई में केवल उन्नतिशील प्रजातियां जैसे को.0118, को.15023, को.लख.14201, को.शा.13235, को.लख.16202, को.शा.18231 एवं को.शा.13231 को ही अपनाएं। साथ ही उन्होंने ट्रेंच विधि से बुवाई करने तथा बीज एवं भूमि को ट्राइकोडर्मा एवं फफूंदनाशी घोल से उपचारित करने पर विशेष जोर दिया।
वरिष्ठ उपाध्यक्ष अवधेश कुमार गुप्ता का संदेश भी इस अवसर पर साझा किया गया। उन्होंने किसानों से अपील की कि बसंतकालीन बुवाई में ट्रेंच विधि (4 फीट) अथवा दूरी विधि (3 से 3.5 फीट) का उपयोग करें। साथ ही उन्होंने किसानों से कोल्हू एवं खांडसारियों को गन्ना न बेचते हुए अपने बेसिक कोटे को सुदृढ़ बनाने का आग्रह किया, ताकि आगामी पेराई सत्र में उन्हें अधिकतम लाभ प्राप्त हो सके।
