
(ओमप्रकाश ‘सुमन’)
पलिया कलां ( खीरी)विद्या भारती विद्यालय ।सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज पलिया कलां – खीरी में दिनांक 12-01-26, को युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद की 164 वीं जयंती पूर्ण श्रद्धा, हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाई गई। पूर्व छात्र परिषद के पदाधिकारीगण एवं विद्यालय के प्रधानाचार्य रामप्रताप सिंह ने मां शारदा एवं स्वामी विवेकानंद के चित्र पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन, पुष्पार्चन एवं वंदना के उपरांत कार्यक्रम का शुभारंभ किया। प्रधानाचार्य ने कार्यक्रम की भूमिका रखते हुए मंचासीन अतिथियों का परिचय कराते हुए उनका स्वागत होली और बैज के साथ किया।इस अवसर पर पूर्व छात्र परिषद के अध्यक्ष विकास बाजपेई, संरक्षक घनश्याम गुप्ता उपाध्यक्ष डॉ. उदित प्रताप दिक्षित महामंत्री भैया अनुराग मौर्य , संयुक्त मंत्री भैया अनुपम बाजपेई , भैया सूर्य प्रकाश पाल, कोषाध्यक्ष भैया गिरीश यादव , प्रचार मंत्री भैया अंकुर सिंह जी, सहप्रचार मंत्री भैया सरस मिश्रा जी, एवं उनके सदस्य भैया नवनीत शुक्ला, भैया आयुष वर्मा जी,भैया हिमांशु दिवाकर, भैया संजीव मिश्रा,भैया निखिल
उपस्थित रहे। विद्यालय के आचार्य चंदेश्वर ने अपनी ओजपूर्ण वाणी के द्वारा स्वामी विवेकानंद के विचारों को सभा के समक्ष रखते हुए बताया कि *स्वामी विवेका नन्द का प्रारंभिक नाम नरेंद्र दत्त बचपन से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे और ईश्वर के अस्तित्व के विषय में जानने के लिए उत्सुक रहते थे। इसी क्रम में एक दिन दक्षिणेश्वर के संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पास गए और वही प्रश्न किया कि क्या आपने ईश्वर को देखा है?परमहंस जी के उत्तर से संतुष्ट होकर नरेंद्र उनके शिष्य हो गए और साधना के उपरांत स्वामी विवेकानंद जी के नाम से विख्यात हुए।आचार्य सुनीत कुमार मिश्रा ने स्वामी जी के व्यक्तित्व की चर्चा करने के उपरांत बताया कि आपकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि आप एक बार जिस पुस्तक को पलट कर देख लेते थे वह उन्हें कंठस्थ हो जाती थी। आप हिंदू धर्म के प्रचार हेतु अमेरिका के शिकागो नगर में आयोजित धर्म संसद में भाग लेने गए। उस कार्यक्रम में जहां सभी धर्मों के अनुयाई अपने-अपने धर्म को श्रेष्ठ बता रहे थे, वहीं स्वामी विवेकानंद ने बताया कि कोई धर्म बड़ा या छोटा नहीं है। सभी धर्मों का उद्देश्य उस परमपिता परमेश्वर तक पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करता है। कार्यक्रम के संरक्षक घनश्याम ने स्वामी विवेकानंद की प्रखर स्मरण शक्ति का उदाहरण सुनाते हुए अपने विचार व्यक्त किए एवं स्वामी जी द्वारा अन्वेषित संजीवनी मुद्रा का भी उल्लेख किया। पूर्व छात्र परिषद के अध्यक्ष विकास बाजपेयी ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि स्वामी जी द्वारा स्थापित रामकृष्ण मठ एवं बेलूर मठ की चर्चा की और स्वामी जी द्वारा युवाओं को दिए गए मंत्र “उठो, जागो और अपने लक्ष्य को प्राप्त किए बिना न रुको।” का भी जिक्र किया। पूर्व छात्र परिषद के उपाध्यक्ष डॉक्टर उदित प्रताप दिक्षित जी ने कहा कि अमेरिका के शिकागो नगर में आयोजित धर्मसभा में स्वामी जी के उद्बोधन “अमेरिका वासी मेरे भाई और बहनों” को वसुधैव कुटुंबकम का सबसे प्रबल उदाहरण बताया। पूर्व छात्र परिषद के प्रचार मंत्री अंकुर सिंह जी ने कहा कि इस छात्र परिषद का उद्देश्य संपर्क, सहयोग, संस्कार, सेवा एवं समर्पण है। स्वामी विवेकानंद के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि स्वामी विवेकानंद एक दूरदर्शी नेता थे जिन्होंने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत को दुनिया के सामने रखा और युवाओं को सशक्त बनाने के लिए काम किया।
कार्यक्रम की संचालिका कु.नैना श्रीमती शिल्पी नाग ने आपको बहुमुखी प्रतिभा का धनी बताते हुए कहा कि आप केवल एक संत ही नहीं थे, अपितु अंग्रेजी,संस्कृत,दर्शन आदि विषयों के भी बहुत अच्छे ज्ञाता थे।
विद्यालय के अध्यक्ष चाँद कुमार जैन ने कहा कि स्वामी विवेकानंद के विचारों का सार है कि: उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत, शिक्षा चरित्र निर्माण करे, सभी धर्मों का सम्मान करो, और सेवा व करुणा ही सच्ची भक्ति है; वे युवाओं को आत्म-विश्वास, निस्वार्थ कर्म और राष्ट्र-निर्माण के लिए प्रेरित करते थे, जो हमें कमजोर करने वाली हर चीज को त्यागने और सकारात्मक विचारों को अपनाने पर जोर देते थे।
विद्यालय के प्रबंधक रामबचन तिवारी अपनी ओजपूर्ण वाणी के द्वारा स्वामी विवेकानंद के विचारों को सभा के समक्ष रखते हुए बताया कि स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को निडर, कर्मठ, और सेवाभावी बनने की प्रेरणा दी, ताकि वे न केवल स्वयं का बल्कि पूरे राष्ट्र का उत्थान कर सकें, सभी धर्मों और संस्कृतियों का सम्मान करते हुए मानवता की सेवा करें।
पूर्व छात्र परिषद के प्रमुख आचार्य अनुराग ने स्वामी विवेकानंद को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहा कि
एक विचार लो। उस विचार को अपना जीवन बना लो – उसके बारे में सोचो उसके सपने देखो, उस विचार को जियो। अपने मस्तिष्क, मांसपेशियों, नसों, शरीर के हर हिस्से को उस विचार में डूब जाने दो, और बाकी सभी विचार को किनारे रख दो। यही सफल होने का तरीका हैं।
सभी कार्यक्रम आचार्य अनुराग श्रीमती प्रीति के निर्देशन में संपन्न किए गए ।इस अवसर पर सरस्वती शिशु /मंदिर इंटर कॉलेज के प्रबंध समिति के सभी पदाधिकारी,समस्त आचार्य परिवार, मैया/ भैया उपस्थित रहे ।
