( समाचार संकलित)

पलिया कलां (खीरी) बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की कुंभी चीनी मिल में देश का पहल बायोपॉलिमर प्लांट होगा इसे स्थापित करने में करीब 2,850 से 3,080 करोड़ रुपये का निवेश होने का अनुमान है।प्लांट की मुख्य बातें

स्थानः कुंभी, लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश

उत्पाद: गन्ने से पॉलिलैक्टिक एसिड (PLA) और बायोप्लास्टिक।बेल्जियम से लाई गई करीब 200 टन वजनी मशीन को लेकर आ रहा 308 पहियों वाला महाट्रक खीरी जिले में दाखिल हो गया है। यह मशीन गोला गोकर्णनाथ के पास कुंभी स्थित बलरामपुर चीनी मिल के बायोपॉलिमर प्लांट में लगाई जाएगी।कुंभी में बलरामपुर चीनी मिल्स लिमिटेड देश का पहला इंटीग्रेटेड बायोपॉलीमर प्लांट बना रही है। फरवरी 2025 में इसकी आधारशिला रखी गई थी। इस पर करीब 2,850 से 3,080 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।प्लांट में गन्ने से पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) बनेगा, जिससे बायोप्लास्टिक तैयार होगा। यह पारंपरिक प्लास्टिक का विकल्प बनेगा। इसकी उत्पादन क्षमता करीब 80 हजार टन प्रतिवर्ष है। यह मशीन अपने विशाल आकार और 308 पहियों वाले महाट्रक के कारण चर्चा में है। लोग इसे देखने के लिए उत्सुक हैं। ट्रक के प्लांट तक पहुंचने का इंतजार है।

बेल्जियम से उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी (कुंभी) तक पहुँचने वाली यह विशाल मशीन (साइक्लाइजेशन रिएक्टर/वैक्यूम बॉयलर) जल मार्ग (समुद्र) और थल मार्ग (सड़क) के एक बेहद जटिल कॉम्बिनेशन के जरिए यहाँ तक पहुंची है

यह मशीन करीब 164 मीट्रिक टन वजनी और 41 मीटर लंबी तथा 7 मीटर ऊंची है, जिसे लखीमपुर खीरी में बलरामपुर चीनी मिल के पास बन रहे देश के पहले बायोप्लास्टिक (PLA बायोपॉलीमर) प्लांट के लिए मंगाया गयाहै।

इसकी पूरी यात्रा को दो मुख्य हिस्सों में समझा जा सकता है:

1. समुद्र के रास्ते बेल्जियम से भारत (पारादीप पोर्ट)मशीन को बेल्जियम में तैयार किया गया और वहां से इसे एक बड़े मालवाहक जहाज (Ship) पर लादकर समुद्री मार्ग के जरिए ओडिशा के पारादीप बंदरगाह (Paradip Port) पर सुरक्षित उतारा गया।

2. 308 पहियों वाले ‘महाबली’ ट्रक से सड़क मार्ग का सफर पारादीप पोर्ट पर उतरने के बाद शुरू हुआ इसका असली और सबसे चुनौतीपूर्ण सफर। इतनी भारी मशीन को साधारण ट्रक से ले जाना असंभव था, इसलिए 308 पहियों वाले एक विशेष हाइड्रोलिक मल्टी-एक्सल ट्रेलर (जिसे सोशल मीडिया पर ‘महाबली’ या ‘बाहुबली’ ट्रक कहा जा रहा है) का इस्तेमाल किया गया।

यह सफर लगभग 5 महीनों तक चला, जिसमें ट्रक ने भारत के 4 राज्यों को पारमशीन को बेल्जियम में तैयार किया गया और वहां से इसे एक बड़े मालवाहक जहाज (Ship) पर लादकर समुद्री मार्ग के जरिए ओडिशा के पारादीप बंदरगाह (Paradip Port) पर सुरक्षित उतारा गया।

308 पहियों वाले ‘महाबली’ ट्रक से सड़क मार्ग का सफर

पारादीप पोर्ट पर उतरने के बाद शुरू हुआ इसका असली और सबसे चुनौतीपूर्ण सफर। इतनी भारी मशीन को साधारण ट्रक से ले जाना असंभव था, इसलिए 308 पहियों वाले एक विशेष हाइड्रोलिक मल्टी-एक्सल ट्रेलर (जिसे सोशल मीडिया पर ‘महाबली’ या ‘बाहुबली’ ट्रक कहा जा रहा है) का इस्तेमाल किया गया।यह सफर लगभग 5 महीनों तक चला, जिसमें ट्रक ने भारत के 4 राज्यों को पारकिया ओडिशा, झारखंड,बिहार व उत्तर प्रदेश उत्तर प्रदेश में दाखिल होने के बाद यह चंदौली, वाराणसी, गाजीपुर, आजमगढ़ और सिद्धार्थनगर के रास्ते होते हुए अपने अंतिम ठिकाने लखीमपुर खीरी पहुँची।रास्ते में आईं बड़ी चुनौतियाँ और उनके समाधानःरास्ते में तोड़-फोड़ और बदलावः कर मशीन को लाया गया है। रास्ते में आईं अभूतपूर्व चुनौतियाँ

इस मशीन को बेल्जियम से लखीमपुर लाने में लगभग 5 से 6 महीने का समय लगा, क्योंकि यह ट्रक अपनी भारी लोडिंग के कारण रोजाना महज 5 से 12 किलोमीटर ही चल पाता था। रास्ते में काफिले को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा: रास्ते की बाधाएं हटानाः ट्रक की ऊंचाई और चौड़ाई इतनी ज्यादा थी कि कई जगहों पर सड़कों के किनारे लगे पेड़ों की छंटाई करनी पड़ी, बिजली के तारों को हटाना पड़ा और फुट ओवरब्रिज व डिवाइडरों को क्रेन की मदद से काटना या ऊपर उठाना पड़ा।

अस्थायी रास्तों का निर्माणः कई जगह संकरी गलियों या कमजोर पुलों से बचने के लिए एनएचएआई (NHAI) और विशेषज्ञों की टीम ने जेसीबी (JCB) की मदद से रातों-रात नए अस्थायी कच्चे रास्ते और डायवर्जन बनाए।भारी सुरक्षा और अमलाः इस पूरे सफर के दौरान ट्रक के साथ करीब 60-64 तकनीकी कर्मचारियों की टीम, क्रेन, हाइड्रा, पुलिस बल और रूट क्लीयरेंस गाड़ियां चौबीसों घंटे साथ चलती रहीं।

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