(न्यूज़- ईं. प्रशांत कुमार)

पलियाकलां- (खीरी)आज दुधवा टाइगर रिजर्व प्रभाग, पलिया-खीरी की बहुप्रतीक्षित गैण्डा परियोजना की सफलता में एक और आयाम स्थापित हुआ। दुधवा टाइगर रिजर्व प्रभाग, पलिया-खीरी की दक्षिण सोनारीपुर रेंज में स्थित प्रथम गैण्डा पुर्नवास केन्द्र से आज 02 गैण्डा और स्वछंद विचरण करने हेतु सफलतापूवर्क अवमुक्त किए गए।यह पहल वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो दुधवा में मुक्त विचरण करने वाले गैंडों की आबादी को मजबूत करने की दिशा में एक नई शुरुआत है। इस अभियान को दुधवा वन विभाग और विश्व प्रकृति निधि भारत की संयुक्त टीम ने सफलतापूर्वक अंजाम दिया। यह महत्वपूर्ण अभियान लंबे समय से चल रहे गैंडा संरक्षण प्रयासों का हिस्सा है। इससे पहले, नवंबर 2024 में भी दो गैंडों को खुले जंगल में छोड़ा गया था। अब, इन दो नए गैंडों की सफल रिहाई के साथ, कुल चार गैंडे अब दुधवा में मुक्त विचरण कर रहे हैं, जो इस अभूतपूर्व परियोजना की सफलता को दर्शाता है।इस महत्वपूर्ण बचाव और पुनर्वासन प्रक्रिया का नेतृत्व प्रसिद्ध वन्यजीव पशु चिकित्सा विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. के.के. शर्मा ने किया। उन्होंने वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करके गैंडों को सुरक्षित रूप से ट्रैक्विलाइज़ किया। ट्रैक्विलाइज़ेशन के बाद, अनुभवी टीम ने गैंडों की बारीकी से निगरानी की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और किसी भी तरह के तनाव में नहीं हैं।

इसके बाद, विशेषज्ञों की एक विशेष टीम ने गैंडों को रेडियो कॉलर लगाया, जिससे उनके जंगल में विचरण और व्यवहार की निगरानी की जा सके। यह कॉलरिंग प्रक्रिया भविष्य में गैंडों की गतिविधियों को ट्रैक करने और उनके संरक्षण में मदद करेगी। इसके अलावा, वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के तहत गैंडों की स्वास्थ्य की जांच की गई। उनके कान पर पहचान चिह्न (नॉचिंग) किया गया और फिर उन्हें अस्थायी बाड़े में रखा गया। जब यह प्रक्रियां पूरी हो गई और यह सुनिश्चित कर लिया गया कि गैंडे पूरी तरह से स्वस्थ हैं, तो उन्हें खुले जंगल में स्वतंत्र रूप से छोड़ दिया गया। इसी प्रक्रिया के तहत दूसरे गैंडे को भी सुरक्षित रूप से ट्रैक्विलाइज़ करके जंगल में छोड़ दिया गया।दुधवा टाइगर रिजर्व के उप वन संरक्षक डॉ० रंगाराजू टी० ने कहा, “दुधवा ने वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। मुक्त विचरण करने वाले गैंडों का यह पुनर्वासन वन्यजीव प्रबंधन की एक ऐतिहासिक पहल है। हमारी टीम ने विश्व प्रकृति निधि भारत के सहयोग से यह सुनिश्चित किया है कि गैंडों का स्थानांतरण वैज्ञानिक और सुरक्षित तरीके से हो।”

दुधवा के मुख्य वन संरक्षक एवं फील्ड डायरेक्टर, श्री एच० राजामोहन ने कहा, “यह दुधवा और भारत के गैंडा संरक्षण के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है। इस अभियान की सफल योजना और क्रियान्वयन यह दर्शाता है कि हम इस प्रजाति के सतत संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध हैं। दुधवा का जंगल अब इन मुक्त गैंडों के लिए एक सुरक्षित और समृद्ध आवास बनने जा रहा है। हम इन गैंडों की निगरानी जारी रखेंगे ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे जंगल में आसानी से घुल-मिल सकें और स्वस्थ जीवन व्यतीत करें।”

दुधवा टाइगर रिजर्व में गैंडा संरक्षण की शुरुआत 1984 में हुई थी, जब असम और नेपाल से गैंडों को यहां लाकर पुनर्वसित किया गया था। इसके बाद से, सख्त सुरक्षा उपायों, प्राकृतिक आवास, प्रबंधन और वैज्ञानिक अनुसंधान की बदौलत यहां गैंडों की संख्या लगातार बढ़ रही है। नवंबर 2024 में दो गैंडों की सफल रिहाई के बाद, अब दो और गैंडों को जंगल में छोड़ा गया है, जिससे कुल चार गैंडों का समूह मुक्त रूप से विचरण कर रहा है। यह ऐतिहासिक घटना मुक्त विचरण करने वाले गैंडों को स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिससे वे अपने प्राकृतिक आवास में स्वतंत्र रूप से घूम सकेंगे और।

पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में योगदान देंगे। रेडियो कॉलर से गैंडों की गतिविधियों, व्यवहार और आवास संबंधी वरीयताओं पर डेटा प्राप्त होगा, जो भविष्य में संरक्षण प्रयासों को मजबूत करेगा।दुधवा टाइगर रिजर्व हमेशा से बाघों की दहाड़ के लिए प्रसिद्ध रहा है, लेकिन अब यह गैंडों की गूंज के साथ एक समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र की पहचान भी बन रहा है। यह ऐतिहासिक कदम न केवल दुधवा बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है, जो यह दर्शाता है कि समर्पित प्रयासों और वैज्ञानिक दृ ष्टिकोण से वन्यजीवों का संरक्षण संभव है।उपरोक्त कार्य पूर्ण होने के समय, प्रधान मुख्य वन संरक्षक, वन्य जीव, उत्तर प्रदेश, लखनऊ, मुख्य वन संरक्षक एवं फील्ड निदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व, लखीमपुर-खीरी, वन संरक्षक/उप निदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व प्रभाग, पलिया-खीरी, प्रभागीय वनाधिकारी, उत्तर खीरी एवं दक्षिण खीरी, लखीमपुर-खीरी, डॉ० के०के० शर्मा, प्रो० एवं हेड डिपार्टमेंट आफ सर्जरी एवं रेडियोलाजी, कालेज आफ वेटनरी साइंस, गुआहाटी असम, डॉ० खनिन चांगमई, असिस्टेंट कोआर्डिनेटर डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया, आसाम, डॉ० मो० तलहा, पशु चिकित्सक, दुधवा टाइगर रिजर्व प्रभाग, पलिया-खीरी, डॉ० दयाशंकर, पशु चिकित्सक, दुधवा टाइगर रिजर्व (बफर जोन), लखीमपुर खीरी, डॉ० दीपक वर्मा, पशु चिकित्सक, कतर्नियाघाट वन्य जीव प्रभाग, बहराइच, डॉ० जी० अरिंद्रन, डायरेक्टर, आईजीसीएमसी, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया, नई दिल्ली, डॉ० मेराज अनवर, कोआर्डिनेटर, ताल-उत्तराखण्ड, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया, रोहित रवि, सीनियर प्रोजेक्ट आफिसर, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया, डॉ० मुदित गुप्ता, सीनियर लैंडस्केप को-ऑर्डिनेटर यूपी, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया, धर्मेन्द्र द्विवदी, वन्य जीव प्रतिपालक, किशनपुर, राजपाल सिंह, क्षेत्रीय वन अधिकारी, दक्षिण सोनारीपुर, विमलेश कुमार, क्षेत्रीय वन अधिकारी, उत्तर सोनारीपुर रेंज, रितेश पटेल, क्षेत्रीय वन अधिकारी, दुधवा, सौमरित भटट्टाचार्य, संचार प्रबन्धक, डब्ल्यू०डब्ल्यू०एफ० इण्डिया व अन्य अधिकारी / कर्मचारीगण, महावत, चाराकटर, विभिन्न रेंजों के दैनिक श्रमिक आदि उपस्थित रहे।

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